SHAURYA
Saturday, 23 May 2020
तुम बदल गए हो।
Monday, 18 May 2020
मैं मजदूर हूँ
Sunday, 3 May 2020
यह समर अनोखा है
Monday, 8 June 2015
ख्वाहिश
टूटते तारों से ख्वाहिश क्या बयान करूँ,
रात दर रात मैने चाँद को पिघलते देखा है।
अौर फिर कतरा कतरा कर, उसी महफिल में,
बढ़ते एक उम्मीद को बहलते देखा है।
वो जो खड़ा है एक सितारा भरमाया सा,
मेरी तरह
एक कदम न फलक से माँग पाता है।
नज़रों ही नज़रों में समझाया उसने,
कि कदमों को उसके भी, एक असमंजस का धोखा है।
की उसने भी जमीं पर उसी "फरिश्ते" को.......
इनसानों की राह भटकते देखा है।
अंकित सिंह
८ जून २०१५
Monday, 11 May 2015
फिर मैकशी
ज़मीर के घायल हैं हम,
हमे आशिक न समझ लेना वाईज़।
वो अौर हैं जो मोहब्बत के गम भुलाने को पीते हैं,
हम मर जाने को पीते हैं।
पैमाना जो हाथ मे है, किसी की बेवफाई का अनजाम नहीं,
दवा-ए-दिल, तसव्वुर-ए-शाम नहीं।
सुबह की पहली किरण मेरी साकी,
इस मैकश की मैकशी का किसी पर इल्जाम नहीं।
लाओ कलम, लिखे देता हूँ अपना नाम अभी मैखाने में,
कि मेरे जाने के बाद,
बेवजह कोई हो न जाए बदनाम कहीं।
-अंकित सिंह
(19 April 2015)
Sunday, 10 May 2015
अब तुम नहीं हो
अब जो तुम नहीं हो,
तुम्हारी बातें कई सवाल किया करती हैं मुझसे।
अब जो तुम नहीं हो,
तुम्हारी यादें कई सवाल किया करती हैं मुझसे।
सभी बातों की बुनियाद तुम साथ ले गए,
सभी यादों को हिजाब तुम दे गए।
मेरे पास जो कुछ आखिरी शब्द हैं,
उनके सहारे क्या जवाब दे पाउँगा,
अब जो तुम नहीं हो।
अब जो तुम नहीं हो,
हकीकत की होश से कोई सुलह नहीं,
अब जो तुम नहीं हो,
ख्वाबों की मदहोशी की कोई वजह नहीं।
ख्वाबों को मेरे, हकीकत ने जला दिया,
मंजिल ने खुद राह का पता मिटा दिया,
जिस तरफ जाऊँ, भटक ही जाऊँगा,
अब जो तुम नहीं हो।
अब जो तुम नहीं हो,
तुम्हारे न होने का, शायद तुम्हे खयाल भी नहीं है।
अब जो तुम नहीं हो,
तुम्हारे न होने का, शायद मुझे एतबार भी नहीं है।
पर अब कहीं यह यकीन भी हो चला है,
कि जिंदगी बस यहीं तक थी...
जो कुछ दो-चार पल बचे हैं,
उन्हे क्या नाम दे पाऊँगा ?
अब जो तुम नहीं हो...
- अंकित सिंह
Friday, 24 April 2015
मोड़
कभी हसीं सफर में फुरसत मिले
तो उस मोड़ को मुड़कर देख लेना,
जहाँ तुम मुझे छोड़ गए थे।
मैं वहीं मिलूँगा ....
मैं वहीं मिलूँगा, और आस पास मेरे
बिखरी मिलेंगी कुछ कोशीशें।
कुछ कोशीशें .....
कुछ जीने की कोशीशें, साँसों को जिसके,
तुम्हारे दिए इल्जाम के बोझ ने उबरने न दिया।
कुछ मरने की कोशीशें, फांसों को जिसके,
तुम्हारे दिए अनजाम की चोट ने उभरने न दिया॥
- अंकित सिंह