कलम ने कागज़ को जब-जब छुआ...
अक्स तेरा ही उभरकर आया है.
रंग अलग है हर पन्ने का...
पर तस्वीर बस एक तेरा ही
बन पाया है.
देखा जहाँ को हर नज़रिए से,
पर तेरे ही नज़रों पर
यह शायर लिख पाया है,
कदम बढे थे कई रस्तों पर,
कलम को पर....
राह तेरा ही एक..भाया है.
हर छोटी मुलाकात ने एहसासों को
क्षितिज तक पहुँचाया है,
हर तन्हा रात ने...
कोरे कागज़ से परिचय तेरा
करवाया है.
लिखा नहीं हमने खुदा पे,
वक़्त नहीं मिल पाया है...
इस काफिर ने बस हर बार लिखा ये...
"तुझमे ही खुदा पाया है."
यादों को पिरोकर शब्दों में,
इस तरह हमने हर पल संजोया है...
इन्ही चाँद रुबाई क सहारे
कभी खुद को खोया,
कभी तुझको पाया है...