Monday, 21 May 2012

रूबरू

आज फिर तुमने मुझे मेरे आप से
रूबरू कर दिया,
एक फ़रिश्ते ने इंसान को उसके औकात से
रूबरू कर दिया.
दूर जाने का यह अंदाज़ हसीं था,
क़दमों के निशां ने तुम्हारे,
जले मेरे जज्बातों की खाक से रूबरू कर दिया.

मजबूरी की डोर से जुड़े रिश्तों की 
नजाकत से रूबरू कर दिया,
उधार की खुशियों की 
करवाहट से रूबरू कर दिया,
बेवजह जीने की जलालत से रूबरू कर दिया...
आज फिर तुमने मुझे मेरे आप से रूबरू कर दिया

खुदा बदल दिया हमने, काफ़िर हो गए...
तुमने आज हमे हमारे कुफ़र से रूबरू कर दिया
इबादत क हमारे असर से रूबरू कर दिया,
बुतपरस्ती के हमारे शिफर से रूबरू कर दिया.

आज फिर तुमने मुझे...