Sunday, 4 September 2011

तुमसे मोहब्बत कहाँ कर पाते...?


कभी इतनी मोहब्बत तुम्हारी की दिल ठहर जाये,
कभी इतनी शिद्दत से नफरत की दिल सहम जाये,
उसपे यह इल्ज़ाम दुनिया का कि,
हम तुम्हे समझ न पाए...
जो समझने में ही वक़्त गंवाते...
तुमसे मोहब्बत कहाँ कर पाते...?

अक्सर खफा हुए तुम और जज्बात
हमारे सिसकते रहे...
अक्सर हवाएं सर्द चलीं,
हम अपने हालातों संग धधकते रहे..
उस पर यह इल्ज़ाम दुनिया का कि,
हम जज्बातों को समझा नहीं पाए...
जो समझाने में ही वक़्त गंवाते...
हम मोहब्बत कहाँ कर पाते...?

दो लब्ज़ प्यार के जब तुम बोल जाते हो,
ज़िन्दगी से फिर कोई शिकवा कहाँ रह जाता है..?
जब किसी बात पर मुसकते हो,
पल भर में सारा जहाँ बदल जाता है.
उस पर यह इल्ज़ाम दुनिया का कि,
हम खुद को बदल नहीं पाए...
जो बदलने में ही वक़्त गंवाते...
तुमसे मोहब्बत कहाँ कर पाते...?

Friday, 15 July 2011

कुछ ख्वाब जला रहा हूँ आज...


कुछ ख्वाब जला रहा हूँ आज...
कुछ ख्वाब... जिनसे अब हकीकत का
इंतज़ार किया नहीं जाता....
कुछ ख्वाब... जिनके बोझ तले अब
जिया नहीं जाता...
कुछ ख्वाब... जिनके जंजीरों में जकड़े अब
आगे का सफ़र तय किया नहीं जाता....

कुछ ख्वाब जला रहा हूँ आज...
जख्म कुछ भर जाये शायद,
यह आखिरी दवा भी आजमा रहा हूँ आज.
जो अश्कों से न बुझी, वो अंगारों से बुझ जाये,
इस प्यास को और भरमा रहा हूँ आज...
कुछ ख्वाब जला रहा हूँ आज....

कुछ ख्वाब जला रहा हूँ आज...
हाँ, कभी इसका आशियाँ होता था जो
दिल,अब सुनसान पड़ा है.
वह भी जलेगा शायद...
एक शमशान में आग लगा रहा हूँ आज,
कुछ ख्वाब...
थमी हुई सांसें भी लह्केंगी साथ-साथ,
रग-रग से इनकी यादों को मिटा
रहा हूँ आज,
कुछ ख्वाब जला रहा हूँ आज...

कुछ ख्वाब जला रहा हूँ आज...
कुछ ख्वाब, जिन्हें वक़्त की आंधी तोड़
हमसे, और हम कुछ बेबस से खड़े थे,
कुछ ख्वाब, जिनमे बड़ी शिद्दत से हज़ारों
रंग भरे थे...
उन्हें उन्ही रंगों बीच दफना रहा हूँ आज...
कुछ ख्वाब जला रहा हूँ आज...

Tuesday, 26 April 2011

इल्ज़ाम



जब भी जुड़ते हैं दिल,
तो उसे रिश्तों का इल्ज़ाम क्यों देते हो..?
जब भी मिलती हैं नज़रें,
तो इन्हें किसी डोर में बाँध क्यों देते हो..?

ज़रा एहसासों को
क्षितिज तक पर फ़ैलाने दो,
दो पल में ही यह उड़ान
काट क्यों देते हो..??

आवारा जज्बातों को
बेबाक बह जाने दो,
हर पल-हर लम्हे को इतनी शिद्दत से
संभाल क्यों लेते हो ??

किया जब सपनों से आगाज़...
अंत में फिर हकीकत से इम्तिहान
क्यों लेते हो...??

इस बरसात में रूह तक भीग
जाने दो..
इस पैमाने में हर कतरा डूब
जाने दो..

एक पल के लिए खुद को भूल,
दूजे पल पहचान क्यों लेते हो..??

Monday, 28 March 2011

"कलम ने पन्ने को जब छुआ"

कलम ने कागज़ को जब-जब छुआ...
अक्स तेरा ही उभरकर आया है.
रंग अलग है हर पन्ने का...
पर तस्वीर बस एक तेरा ही
बन पाया है.

देखा जहाँ को हर नज़रिए से,
पर तेरे ही नज़रों पर
यह शायर लिख पाया है,
कदम बढे थे कई रस्तों पर,
कलम को पर....
राह तेरा ही एक..भाया है.

हर छोटी मुलाकात ने एहसासों को
क्षितिज तक पहुँचाया है,
हर तन्हा रात ने...
कोरे कागज़ से परिचय तेरा
करवाया है.

लिखा नहीं हमने खुदा पे,
वक़्त नहीं मिल पाया है...
इस काफिर ने बस हर बार लिखा ये...
"तुझमे ही खुदा पाया है."

यादों को पिरोकर शब्दों में,
इस तरह हमने हर पल संजोया है...
इन्ही चाँद रुबाई क सहारे
कभी खुद को खोया,
कभी तुझको पाया है...

Sunday, 27 February 2011

"मैकशी "


उम्मीद बहुत  थी तुझसे साकी...
पर मय तेरा कुछ फीका  है ,
है हाँथों में तेरे सुरा छलकती ...
पर दिल तेरा भी सूखा है.

होगी तेरे प्याले की गहराई अपार,
पर नहीं उतरता यह दिल के पार.
पल-दो-पल इंसान खुद को भूल जाता है,
पर साए से तेरे  निकलते ही...
तिश्नगी को फिर पहलू में पाता है.

यह हँसी तेरी बड़ी बनावटी..
तू हम नादानों को देख मुस्काती है.
दवा की उम्मीद लिए जो तेर दर पर आये..
ज़हर भी ठीक से उन्हें  न दे पाती है.

यह अदा तेरी बड़ी बेतुकी,
तू किस बात पर यूँ इतराती है..?
जब तेरे हाथों पैमाने पीकर,
नशे में डूब दुनिया... तुझे ही भूल जाती है.

समझ नहीं आता...क्या कहूं इसे...??
बेवफाई या बेखुदी...
शायद इसी अदा को दुनिया कहती है...
"मैकशी "

Monday, 21 February 2011

ज़ख्म वह क्या...जिसे वक़्त भर जाये.

ज़ख्म वह क्या... जिसे वक़्त भर जाये,
ज़ख्म वो 
कोशिश करे जिसे  भरने का...हर वह पल
सुर्ख लहू से तर जाये.
उतर जाये जिसका नशा लम्हों के दामन में,
उस बेवफा दर्द से मदहोश दवा की उम्मीद
क्या की जाये...??

जख्म वह क्या...जिसके रहते पलकें सूख जाये,
ज़ख्म वो ....
जिसकी टीस से  लड़ता समय भी घायल हो जाये ,
ज़ख्म वो...
जो साँसों का हिस्सा बन जाये, 
ज़ख्म वो...
खुदा की खुदाई भी जिसे देकर पल-पल पछ्ताए 

ज़ख्म वह क्या...जिसे वक़्त भर जाये.

Monday, 17 January 2011

"KHAMOSHI..."

Na amawas k aasman me,

Na registan k sunsaan me,

Teri  khamoshi ki yeh ada….

Na hai… na hogi, dono jahan me.

 

Na  lubzon se guftagoo,

Na nazrein hi rubaroo,

Bus teri khamoshi ka nasha…

Chhaa raha hai harsu...

 

Na aksharon ki dor,

Na suron ka shor,

Na khud par zor….

Bus baras rahi teri khamoshi

Bankar ghata ghanghor.

 

Deewane ne dil kab ka hara,

Umeed k majhdhar me ….

Na dikha kinara.

Kabhi teri khamoshi ne duboya,

Kabhi teri khamoshi ne ubara...

 

Hai farsh jaise shamshan,

Hai arsh v veeran,

Teri khmoshi se hairan,

Shayad...khamosh hai bhagwan.

 

Ek taraf nafrat ki chubhan,

Doosri ore mohabbat ki agan,

Hain beech me kahin ehsaas dafan….

 

Ab v kuch bol de zalim…


Intezar me tere…

Kahin teri khamoshi se hi na lag

Jaye lagan....