कभी इतनी मोहब्बत तुम्हारी की दिल ठहर जाये,
कभी इतनी शिद्दत से नफरत की दिल सहम जाये,
उसपे यह इल्ज़ाम दुनिया का कि,
हम तुम्हे समझ न पाए...
जो समझने में ही वक़्त गंवाते...
तुमसे मोहब्बत कहाँ कर पाते...?
अक्सर खफा हुए तुम और जज्बात
हमारे सिसकते रहे...
अक्सर हवाएं सर्द चलीं,
हम अपने हालातों संग धधकते रहे..
उस पर यह इल्ज़ाम दुनिया का कि,
हम जज्बातों को समझा नहीं पाए...
जो समझाने में ही वक़्त गंवाते...
हम मोहब्बत कहाँ कर पाते...?
दो लब्ज़ प्यार के जब तुम बोल जाते हो,
ज़िन्दगी से फिर कोई शिकवा कहाँ रह जाता है..?
जब किसी बात पर मुसकते हो,
पल भर में सारा जहाँ बदल जाता है.
उस पर यह इल्ज़ाम दुनिया का कि,
हम खुद को बदल नहीं पाए...
जो बदलने में ही वक़्त गंवाते...
तुमसे मोहब्बत कहाँ कर पाते...?
No comments:
Post a Comment