
जब भी जुड़ते हैं दिल,
तो उसे रिश्तों का इल्ज़ाम क्यों देते हो..?
जब भी मिलती हैं नज़रें,
तो इन्हें किसी डोर में बाँध क्यों देते हो..?
ज़रा एहसासों को
क्षितिज तक पर फ़ैलाने दो,
दो पल में ही यह उड़ान
काट क्यों देते हो..??
आवारा जज्बातों को
बेबाक बह जाने दो,
हर पल-हर लम्हे को इतनी शिद्दत से
संभाल क्यों लेते हो ??
किया जब सपनों से आगाज़...
अंत में फिर हकीकत से इम्तिहान
क्यों लेते हो...??
इस बरसात में रूह तक भीग
जाने दो..
इस पैमाने में हर कतरा डूब
जाने दो..
एक पल के लिए खुद को भूल,
दूजे पल पहचान क्यों लेते हो..??