Saturday, 23 May 2020

तुम बदल गए हो।


कल जाने कहाँ से जानी अनजानी आवाज़ आयी, 
"तुम बदल गए हो?"
मैने कहा, "क्या ऐसा देखा मुझ में जो पहले न था?"
कहा उसने, "अब तुम्हारी ये आँखें बोला नहीं करती, 
इन्हें क्यूँ इतना खामोश कर दिया तुमने?"

मैने कहा, "क्या करता, मजबूर था, इन्हें सच बोल जाने की 
आदत थी।
अक्सर ये वही कह जाते, जो वो सुनना नहीं चाहते थे।
इन पे न ज़ोर कोई मेरा था।"

उसने कहा, "कब तक सच को खामोश रख पाओगे,
आज न कल, दर्द बन के आंसू संग बह जाएंगे"
मैं मुस्कुराया, "ये नहीं बह पाएंगे, ये मुझी में डूब जाएंगे,
इन ख्वाबों को पलकों का सहारा नहीं।"

उसने कहा, "नफरत है मुझे तुम्हारी इस झूठी मुस्कुराहट से,
बोहत शिकायत है मुझे तुम्हारी बातों की इस बनावट से।
इक बार खुद से तो सच कह दो!"

मैंने कहा,"सच बस इतना है कि, जो एक सच है मेरा,
उसे सच होने का इख्तियार नहीं,
और मुझे, इस सच के झूठ होने का ऐतबार नहीं।

पहलू से उठ वो जाने को हुए, और जाते जाते कह गए,
"तुम कभी नहीं बदलोगे।"

-अंकित कुमार सिंह
२४.०५.२०२०
(प्रथम प्रारूप: २५.०२.२०१४)

Monday, 18 May 2020

मैं मजदूर हूँ

कर्म में प्रबल, विधि से विफल हूँ,
तन से बली, भाग्य से दुर्बल हूँ।
मैं वह जो आजीवन मजबूर हूँ, मैं मजदूर हूँ।

बुद्ध भूमि में जन्मा, बुद्धू कहलाता हूँ,
समक का ज्ञान नहीं, निरंतर विषम से टकराता हूँ।
हाँ जीवन मृत्यु दोनो से निष्ठुर हूँ, मैं मजदूर हूँ।

किया ताज निर्माण, फिर किया हस्त बलिदान,
"जय जवान, जय किसान", पर नहीं मेरा कोई सम्मान।
युगों युगों से यश-अपयश दोनो से दूर  हूँ, मैं मजदूर हूँ।

दिन खुद को तपा के, रात चूल्हे की आग कमाता हूँ,
जिस रोज़ न मिली रोज़ी, रोटी बिन सो जाता हूँ।
अक्सर बीरबल की खिचड़ी पकाता हूँ, मैं मजदूर हूँ।

घर बहुत दूर है मेरा, अपने घर जाना चाहता हूँ,
शहर बहुत देवों के  बसाये, पराये शहर से अब दूर होना चाहता हूँ।
चला जा रहा हूँ...चला जा रहा हूँ...
मेरा गाँव नहीं आता, एक संशय आता-जाता है...

क्योंकि, अक्सर मेरे कदमों से पहले, मेरी नियति थक जाती है, मैं मजदूर हूँ।

-अंकित सिंह
१८.०५.२०२०

















Sunday, 3 May 2020

यह समर अनोखा है

यह समर अनोखा है, न रण ऐसा देखा है,
शत्रु अदृश्य, है प्रबल, माया सदृश इसकी काया सचल।
न इसे शोणित का भय, न कुठार को शीश नवाता है,
मानव विरुद्ध, मानव को ही बरछी-ढाल बनाता है। 

महारथी देश-देशांतर घर बैठ ही करते विचार,
ये शत्रु कैसा, बिन प्रयोग ही हुए सब शस्त्र लाचार।
जो युद्धभूमि में आये, बुद्धिहीन कहलाता है,
वीरता की अब परिभाषा, चारदीवारी में कौन
अधिकतम वक़्त बिताता है!!

हर ढलती शाम संग, रिपु वर्चस्व और गहराता है,
बिन कवच-कुंडल तो रश्मिरथी भी हार जाता है।
कहीं अजय का टूटता अहंकार, कहीं निर्बल की भूखी चित्कार।
अरि विमुख, ना जाने व्यवहार, करे सब मानव पर निष्पक्ष प्रहार।

यह समर अनोखा है, 
हे मानव, न रण ऐसा देखा है!
परंतु युद्ध सिद्धान्त अबभी वही सिखलाता है,
रण में, बाहुबल से प्रथम मनोबल ही आता है।

वैरी का परिचय-प्रमाण, गर अनिश्चित भी हो इसका परिमाण,
हिमालय से बन दृढ़, भीष्म संकल्प से हो निश्चित तेरा परिणाम।
बाहर मत देख मनुष्य, कुरुक्षेत्र तो आज निज तेरा है अंतर्मन,
समझ, पराजित मानव मूलों को ही विजयी बनाने का यह क्षण।

यह समर अनोखा है।

-अंकित कुमार सिंह
3 मई, 2020