यह समर अनोखा है, न रण ऐसा देखा है,
शत्रु अदृश्य, है प्रबल, माया सदृश इसकी काया सचल।
न इसे शोणित का भय, न कुठार को शीश नवाता है,
मानव विरुद्ध, मानव को ही बरछी-ढाल बनाता है।
महारथी देश-देशांतर घर बैठ ही करते विचार,
ये शत्रु कैसा, बिन प्रयोग ही हुए सब शस्त्र लाचार।
जो युद्धभूमि में आये, बुद्धिहीन कहलाता है,
वीरता की अब परिभाषा, चारदीवारी में कौन
अधिकतम वक़्त बिताता है!!
हर ढलती शाम संग, रिपु वर्चस्व और गहराता है,
बिन कवच-कुंडल तो रश्मिरथी भी हार जाता है।
कहीं अजय का टूटता अहंकार, कहीं निर्बल की भूखी चित्कार।
अरि विमुख, ना जाने व्यवहार, करे सब मानव पर निष्पक्ष प्रहार।
यह समर अनोखा है,
हे मानव, न रण ऐसा देखा है!
परंतु युद्ध सिद्धान्त अबभी वही सिखलाता है,
रण में, बाहुबल से प्रथम मनोबल ही आता है।
वैरी का परिचय-प्रमाण, गर अनिश्चित भी हो इसका परिमाण,
हिमालय से बन दृढ़, भीष्म संकल्प से हो निश्चित तेरा परिणाम।
बाहर मत देख मनुष्य, कुरुक्षेत्र तो आज निज तेरा है अंतर्मन,
समझ, पराजित मानव मूलों को ही विजयी बनाने का यह क्षण।
यह समर अनोखा है।
-अंकित कुमार सिंह
3 मई, 2020
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