कल जाने कहाँ से जानी अनजानी आवाज़ आयी,
"तुम बदल गए हो?"
मैने कहा, "क्या ऐसा देखा मुझ में जो पहले न था?"
कहा उसने, "अब तुम्हारी ये आँखें बोला नहीं करती,
इन्हें क्यूँ इतना खामोश कर दिया तुमने?"
मैने कहा, "क्या करता, मजबूर था, इन्हें सच बोल जाने की
आदत थी।
अक्सर ये वही कह जाते, जो वो सुनना नहीं चाहते थे।
इन पे न ज़ोर कोई मेरा था।"
उसने कहा, "कब तक सच को खामोश रख पाओगे,
आज न कल, दर्द बन के आंसू संग बह जाएंगे"
मैं मुस्कुराया, "ये नहीं बह पाएंगे, ये मुझी में डूब जाएंगे,
इन ख्वाबों को पलकों का सहारा नहीं।"
उसने कहा, "नफरत है मुझे तुम्हारी इस झूठी मुस्कुराहट से,
बोहत शिकायत है मुझे तुम्हारी बातों की इस बनावट से।
इक बार खुद से तो सच कह दो!"
मैंने कहा,"सच बस इतना है कि, जो एक सच है मेरा,
उसे सच होने का इख्तियार नहीं,
और मुझे, इस सच के झूठ होने का ऐतबार नहीं।
पहलू से उठ वो जाने को हुए, और जाते जाते कह गए,
"तुम कभी नहीं बदलोगे।"
-अंकित कुमार सिंह
२४.०५.२०२०
(प्रथम प्रारूप: २५.०२.२०१४)
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