
कुछ ख्वाब जला रहा हूँ आज...
कुछ ख्वाब... जिनसे अब हकीकत का
इंतज़ार किया नहीं जाता....
कुछ ख्वाब... जिनके बोझ तले अब
जिया नहीं जाता...
कुछ ख्वाब... जिनके जंजीरों में जकड़े अब
आगे का सफ़र तय किया नहीं जाता....
कुछ ख्वाब जला रहा हूँ आज...
जख्म कुछ भर जाये शायद,
यह आखिरी दवा भी आजमा रहा हूँ आज.
जो अश्कों से न बुझी, वो अंगारों से बुझ जाये,
इस प्यास को और भरमा रहा हूँ आज...
कुछ ख्वाब जला रहा हूँ आज....
कुछ ख्वाब जला रहा हूँ आज...
हाँ, कभी इसका आशियाँ होता था जो
दिल,अब सुनसान पड़ा है.
वह भी जलेगा शायद...
एक शमशान में आग लगा रहा हूँ आज,
कुछ ख्वाब...
थमी हुई सांसें भी लह्केंगी साथ-साथ,
रग-रग से इनकी यादों को मिटा
रहा हूँ आज,
कुछ ख्वाब जला रहा हूँ आज...
कुछ ख्वाब जला रहा हूँ आज...
कुछ ख्वाब, जिन्हें वक़्त की आंधी तोड़
हमसे, और हम कुछ बेबस से खड़े थे,
कुछ ख्वाब, जिनमे बड़ी शिद्दत से हज़ारों
रंग भरे थे...
उन्हें उन्ही रंगों बीच दफना रहा हूँ आज...
कुछ ख्वाब जला रहा हूँ आज...