Monday, 11 May 2015

फिर मैकशी

ज़मीर के घायल हैं हम,
हमे आशिक न समझ लेना वाईज़।

वो अौर हैं जो मोहब्बत के गम भुलाने को पीते हैं,
हम मर जाने को पीते हैं।

पैमाना जो हाथ मे है, किसी की बेवफाई का अनजाम नहीं,
दवा-ए-दिल, तसव्वुर-ए-शाम नहीं।

सुबह की पहली किरण मेरी साकी,
इस मैकश की मैकशी का किसी पर इल्जाम नहीं।

लाओ कलम, लिखे देता हूँ अपना नाम अभी मैखाने में,
कि मेरे जाने के बाद, 
बेवजह कोई हो न जाए बदनाम कहीं।

-अंकित सिंह
(19 April 2015)

Sunday, 10 May 2015

अब तुम नहीं हो

अब जो तुम नहीं हो,
तुम्हारी बातें कई सवाल किया करती हैं मुझसे।
अब जो तुम नहीं हो,
तुम्हारी यादें कई सवाल किया करती हैं मुझसे।

सभी बातों की बुनियाद तुम साथ ले गए,
सभी यादों को हिजाब तुम दे गए।
मेरे पास जो कुछ आखिरी शब्द हैं,
उनके सहारे क्या जवाब दे पाउँगा,
अब जो तुम नहीं हो।

अब जो तुम नहीं हो,
हकीकत की होश से कोई सुलह नहीं,
अब जो तुम नहीं हो,
ख्वाबों की मदहोशी की कोई वजह नहीं।

ख्वाबों को मेरे, हकीकत ने जला दिया,
मंजिल ने खुद राह का पता मिटा दिया,
जिस तरफ जाऊँ, भटक ही जाऊँगा,
अब जो तुम नहीं हो।

अब जो तुम नहीं हो,
तुम्हारे न होने का, शायद तुम्हे खयाल भी नहीं है।
अब जो तुम नहीं हो,
तुम्हारे न होने का, शायद मुझे एतबार भी नहीं है।

पर अब कहीं यह यकीन भी हो चला है,
कि जिंदगी बस यहीं तक थी...
जो कुछ दो-चार पल बचे हैं,
उन्हे क्या नाम दे पाऊँगा ?
अब जो तुम नहीं हो...

- अंकित सिंह