ज़मीर के घायल हैं हम,
हमे आशिक न समझ लेना वाईज़।
वो अौर हैं जो मोहब्बत के गम भुलाने को पीते हैं,
हम मर जाने को पीते हैं।
पैमाना जो हाथ मे है, किसी की बेवफाई का अनजाम नहीं,
दवा-ए-दिल, तसव्वुर-ए-शाम नहीं।
सुबह की पहली किरण मेरी साकी,
इस मैकश की मैकशी का किसी पर इल्जाम नहीं।
लाओ कलम, लिखे देता हूँ अपना नाम अभी मैखाने में,
कि मेरे जाने के बाद,
बेवजह कोई हो न जाए बदनाम कहीं।
-अंकित सिंह
(19 April 2015)
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