अब जो तुम नहीं हो,
तुम्हारी बातें कई सवाल किया करती हैं मुझसे।
अब जो तुम नहीं हो,
तुम्हारी यादें कई सवाल किया करती हैं मुझसे।
सभी बातों की बुनियाद तुम साथ ले गए,
सभी यादों को हिजाब तुम दे गए।
मेरे पास जो कुछ आखिरी शब्द हैं,
उनके सहारे क्या जवाब दे पाउँगा,
अब जो तुम नहीं हो।
अब जो तुम नहीं हो,
हकीकत की होश से कोई सुलह नहीं,
अब जो तुम नहीं हो,
ख्वाबों की मदहोशी की कोई वजह नहीं।
ख्वाबों को मेरे, हकीकत ने जला दिया,
मंजिल ने खुद राह का पता मिटा दिया,
जिस तरफ जाऊँ, भटक ही जाऊँगा,
अब जो तुम नहीं हो।
अब जो तुम नहीं हो,
तुम्हारे न होने का, शायद तुम्हे खयाल भी नहीं है।
अब जो तुम नहीं हो,
तुम्हारे न होने का, शायद मुझे एतबार भी नहीं है।
पर अब कहीं यह यकीन भी हो चला है,
कि जिंदगी बस यहीं तक थी...
जो कुछ दो-चार पल बचे हैं,
उन्हे क्या नाम दे पाऊँगा ?
अब जो तुम नहीं हो...
- अंकित सिंह
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