कभी हसीं सफर में फुरसत मिले
तो उस मोड़ को मुड़कर देख लेना,
जहाँ तुम मुझे छोड़ गए थे।
मैं वहीं मिलूँगा ....
मैं वहीं मिलूँगा, और आस पास मेरे
बिखरी मिलेंगी कुछ कोशीशें।
कुछ कोशीशें .....
कुछ जीने की कोशीशें, साँसों को जिसके,
तुम्हारे दिए इल्जाम के बोझ ने उबरने न दिया।
कुछ मरने की कोशीशें, फांसों को जिसके,
तुम्हारे दिए अनजाम की चोट ने उभरने न दिया॥
- अंकित सिंह
इन पंक्तियों के पीछे की प्रेरणा श्रोत के बारे में बता कर हमे कृतार्थ तथा प्रोत्साहित करें। अंदर तक झकझोरने वाली इन पंक्तियों को रचने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद।
ReplyDeleteआपका मित्र,
पंक्तियों को इतनी गहराई तक समझने के लिए बेहद धन्यवाद।
ReplyDeleteकवि से उसकी कलम का नाम नहीं पूछा करते,
भरी महफिल में किसी को यूं रुसवा करना ठीक नहीं।
मित्रों के नाम भी होते हैं.... :)