टूटते तारों से ख्वाहिश क्या बयान करूँ,
रात दर रात मैने चाँद को पिघलते देखा है।
अौर फिर कतरा कतरा कर, उसी महफिल में,
बढ़ते एक उम्मीद को बहलते देखा है।
वो जो खड़ा है एक सितारा भरमाया सा,
मेरी तरह
एक कदम न फलक से माँग पाता है।
नज़रों ही नज़रों में समझाया उसने,
कि कदमों को उसके भी, एक असमंजस का धोखा है।
की उसने भी जमीं पर उसी "फरिश्ते" को.......
इनसानों की राह भटकते देखा है।
अंकित सिंह
८ जून २०१५
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